अनुसंधान और विकास

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विद्युत क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास एक प्राथमिकता वाला प्रमुख क्षेत्र है। 1,73,000 मेगावाट (31.03.2011 के अनुसार) से अधिक की कुल संस्थापित क्षमता सहित और 2012 तक सोसायटी के प्रत्येक स्तर पर वहनीय गुणवत्ता वाली विद्युत उपलब्ध कराने के दृष्टिकोण के साथ, केवल यह सुनिश्चित किए जाने की आवश्यकता नहीं है कि स्टेट-ऑफ-द-आर्ट टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जाए, बल्कि देश में सामाजिक प्रचालन स्थितियों के मद्देनजर उपयुक्त तकनीक विकसित भी की जाए, और पूंजी गहन क्षेत्र में अर्थव्यवस्था का अवलोकन करने की आवश्यकता है।

विस्तृत रूप से, आर एंड डी के दो आयाम हैं अर्थात्

  • विद्युत के उत्पादन/पारेषण एवं वितरण के लिए वैद्युतिक उपस्कर विनिर्माण उद्योग के लिए आर एंड डी।
  • विभिन्न तकनीकों, कार्यवाहियां, प्रक्रियाओं, रख-रखाव की दक्षता और प्रभावकारिता में सुधार और तकनीकी-आर्थिक एवं प्रौद्योगिकी की दृष्टि से उपस्कर के अनुरक्षण से संबंधित अनुसंधान सहित अनुप्रयुक्त अनुसंधान।

अनुसंधान लागत निषेधात्मक रूप से अधिक होने के कारण यह आवश्यक है कि अधिक दक्षता लागत प्रभावी तरीके से लक्ष्य प्राप्ति हेतु विश्व स्तरीय स्टेट-ऑफ-द-आर्ट प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जाए। ऐसा करने के लिए, हम लोग नवीनतम तकनीकों का मूल्यांकन करने, अपनी अनुप्रयुक्त आवश्यकताओं के अनुकूल उपलब्ध प्रौद्योगिकियों को अंगीकार करने और अपनी स्वयं की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु अपनी स्वयं की वस्तुओं, जहां आवश्यकता हो, का विकास करने की स्थिति में अवश्य हों।

अगले 15 वर्षों में भावी अनुसंधान एवं विकास योजना तैयार करने के लिए और अवसंरचना के इष्टतम उपयोग के लिए समय-समय पर सिफारिशें करने, निधियां जुटाने और यह सुनिश्चित करने, कि अनुसंधान का फल उपभोक्ताओं को मिले तथा क्षेत्र की प्रचालनात्मक दक्षता में वृद्धि हो, के लिए 2001 में विद्युत मंत्रालय द्वारा अध्यक्ष/सीईए की अध्यक्षता में, विद्युत क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास संबंधी स्थायी समिति (एससीआरडी) का गठन किया गया । विद्युत के विनिर्दिष्ट क्षेत्रों अर्थात् पारेषण, वितरण, थर्मल, ऊर्जा संरक्षण, जल एवं नवीकरणीय के क्षेत्र में कार्यबल अनुसंधान एवं विकास प्रस्तावों का मूल्यांकन करने में एससीआरडी की सहायता करते हैं। प्रारंभ में एससीआरडी ने 4 (चार) आर एंड डी परियोजनाओं की सिफारिश की थी जिन्हें 10वीं योजना के दौरान विभिन्न संगठनों द्वारा लिया गया था। तत्पश्चात्, एससीआरडी द्वारा संस्तुत 7 (सात) परियोजनाओं को 11वीं योजना के लिए विद्युत मंत्रालय द्वारा अनुमोदित किया जा चुका है।

एनटीपीसी द्वारा 1981 में अनुसंधान एवं विकास केन्द्र स्थापित किया गया था। तत्पश्चात्, अनुसंधान क्रियाकलापों को बढ़ाने हेतु 2004 में ऊर्जा प्रौद्योगिकी केन्द्र की स्थापना की गई थी। ऊर्जा प्रौद्योगिकियों तथा अनुसंधान एवं विकास विभाग के बीच सहक्रिया लाने तथा अनुसंधान परियोजनाओं को प्रयोगयोग्य प्रौद्योगिकी में शीघ्र ही रूपांतरित करने में समर्थ बनाने के लिए उनके प्रयत्नों तथा संसाधनों को एकीकृत करने के क्रम में, 2009 में इन विभागों को एनटीपीसी एनर्जी टेक्नोलॉजी रिसर्च एलायंस (एनईटीआरए) का गठन करने के लिए मिला दिया गया। एनईटीआरए का दृष्टिकोण संकल्पना से लेकर चालू होने तक बेजोड़ कार्य को संभव बनाने के लिए विद्युत शक्ति के क्षेत्र में अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास तथा वैज्ञानिक सेवाओं के लिए अद्वितीय केन्द्र का है। एनईटीआरए काम्प्लेक्स ईसीबीसी (ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता)  का अनुपालन करने वाला एनटीपीसी का प्रथम भवन है। एनईटीआरए के ध्यान केन्द्रित क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन एवं अपशिष्ट प्रबंधन; नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा; दक्षता सुधार एवं लागत में कमी तथा स्टेशनों (एनटीपीसी एवं इससे बाहर, दोनों ही) को वैज्ञानिक सहायता प्रदान करना शामिल है।

निम्नलिखित मूल उद्देश्य एवं लक्ष्यों के साथ भारतीय विद्युत क्षेत्र के लिए उत्कृष्टता संवर्द्धन केन्द्र (जर्मन सहायता के साथ) स्थापित किया जा रहा है:

  • विद्युत क्षेत्र में हर दिशा की सर्वोत्तम प्रैक्टिस की जानकारी लेने-देने के लिए आपसी मंच प्रदान करना और विस्तृत विशेषज्ञता प्रदान करना।
  • उत्कृष्टता की आवश्यकता के प्रति जागरुकता पैदा करना।
  • विद्युत उद्योग तथा विद्युत संयंत्र प्रचालकों में प्रौद्योगिकीय विकास के लिए आपसी बातचीत के लिए मंच प्रदान करना।
  • विद्युत क्षेत्र के शीर्षस्थ विशेषज्ञों से परामर्श करके विद्युत क्षेत्र से संबंधित समस्याओं के संबंध में संयुक्त समाधान ढूंढना, तथा समस्या दूर करने के लिए संयुक्त कार्य योजना बनाना।
  • विद्युत स्टेशनों में सर्वोत्तम प्रैक्टिस का प्रसार करना।
  • विद्युत क्षेत्र में उत्कृष्टता का विकास करने और उसे बढ़ावा देने के लिए उपयोगी ज्ञान का पत्रिकाओं, पत्रकों अथवा मुद्रण के अन्य माध्यमों से प्रसारित करने के लिए उचित सामगी का अनुवाद, मुद्रण, प्रकाशन करवाना और परिचालित करना।

सीईए ने आईआईटी, दिल्ली में एक स्थान सृजित किया है जिसमें विद्युत मंत्रालय के तथा सीईए के अधिकारियों (अब एनपीटीआई और सीपीआरआई के अधिकारी भी) को उनके ज्ञान और कौशल का उन्नयन करने के लिए नामांकित किया जाता है।

विद्युत क्षेत्र के लिए विनिर्दिष्ट अनुप्रयुक्त अनुसंधान के लिए, मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में एक स्वशासी निकाय अर्थात् केन्द्रीय विद्युत अनुसंधान संस्थान (सीपीआरआई) स्थापित किया गया है और इसे अनिवार्य अनुसंधान स्कीमें चलाने के लिए योजना शीर्ष के अंतर्गत निधियां प्रदान की जा रही हैं।

वैद्युत प्रणालियों एवं उपकरणों के निर्माता, भारत हैवी इलेक्ट्रकल्स लि. के सिवाय, अधिकतर अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के अनुसंधान एवं विकास पर निर्भर करते हैं। भेल का अपना खुद का पृथक अनुसंधान एवं विकास विभाग है। इस समय केन्द्रीय और राज्य विद्युत यूटिलिटियों में आंतरिक अनुसंधान एवं विकास पर, अनुसंधान एवं विकास कक्षों द्वारा उनके अनुमत संसाधनों की सीमा में ध्यान दिया जाता है।

इसके अतिरिक्त, विद्युत क्षेत्र के संगठन भी अपनी आवश्यकता और कार्यकलापों के क्षेत्र पर निर्भर करते हुए, अपने वित्तीय संसाधनों के अध्यधीन, लघु अनुसंधान एवं विकास परियोजनाएं शुरू कर रहे हैं। शैक्षणिक अनुसंधान और प्रौद्योगिकीय उन्नयन के लिए, ये क्षेत्र आईआईटी एवं आईआईएससी जैसे मौजूदा संस्थानों में चल रहे अनुसंधानों पर निर्भर हैं। इस मंत्रालय में टी एंड आर प्रभाग, राष्ट्रीय विद्युत प्रशिक्षण संस्थान तथा केन्द्रीय विद्युत अनुसंधान संस्थान के प्रशिक्षण और अनुसंधान तथा प्रशासन का कार्य देखता है। ये दोनों संस्थान क्रमशः प्रशिक्षण और अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में कार्यरत स्वशासी पंजीकृत निकाय हैं। एनपीटीआई और सीपीआरआई के ब्योरे उनकी वेबसाईट एचटीटीपीकॉलनडबलऑब्लिकएनपीटीआईडॉटएनआईसीडॉटइन (http://www.npti.nic.in) एवं एचटीटीपीकॉलनडबलऑब्लिकसीपीआरआईडॉटएनआईसीडॉटइन (http://www.cpri.in) पर उपलब्ध हैं।